श्री कृष्ण भक्ति के भक्तिकालीन प्रणेता श्री वल्लभाचार्य जी की जयंती भारत में किसी लोकप्रिय त्योहार से कम नहीं है। श्री वल्लभाचार्य की जंयती पूरे भारत में धूमधाम से मनाई जाती है। लोकप्रिय पौराणिक धारणा है कि इस दिन भगवान कृष्ण को श्रीनाथजी के रूप में वल्लभाचार्य ने देखा था, जिन्हें पुष्ती संप्रदाय के संस्थापक कहा जाता है। वल्लभाचार्य जयंती माघ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है। श्री वल्लभाचार्य का प्राकट्य वैशाख कृष्ण एकादशी को चम्पारण्य (रायपुर, छत्तीसगढ़) में हुआ था। सोमयाजी कुल के तैलंग ब्राह्मण लक्ष्मण भट्ट और माता इलम्मागारू के यहां जन्मे वल्लभाचार्य का अधिकांश समय काशी, प्रयाग और वृंदावन में ही बीता। काशी में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और वहीं उन्होंने अपने मत का उपदेश भी दिया। भगवान कृष्ण को सर्वोच्च भगवान कहा जाता है और ऐसा माना जाता था कि उनके आशीर्वाद मोक्ष प्राप्त करने के लिए किसी भी इंसान की मदद कर सकते हैं। इसलिए, श्रीनाथजी के रूप में भगवान कृष्ण की पूजा की गई और जिसे वल्लभाचार्य ने उचित ठहराया, जो वैष्णव संप्रदाय के सबसे लोकप्रिय संतों में से एक थे। इस तथ्य के कारण, वल्लभाचार्य जयंती हर साल श्री वल्लभाचार्य और भगवान कृष्ण के भक्तों द्वारा बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाई जाती है। महाप्रभु वल्लभाचार्य के सम्मान में भारत सरकार ने सन 1977 में एक रुपये मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया था। इस वर्ष महाप्रभु वल्लभाचार्य की जंयती 30 अप्रैल मंगलवार को मनाई जाएगी।

वल्लभाचार्य का जीवन

वल्लभाचार्य जन्म से ही अद्वितय शक्ति के साथ पैदा हुए थे। उनमें ज्ञान का अपार भंडार था। मात्र 7 वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत धारण करने के बाद 4 माह में ही वेद उपनिषद आदि शास्त्रों का अध्ययन किया तथा 11 वर्ष की आयु में अपनी अद्भुत प्रतिभा का प्रमाण देते हुए दक्षिणांचल में विजय नगर के राजा कृष्णदेव की राज्यसभा में उपस्थित होकर संपूर्ण विद्वानों को निरुत्तर कर दिया था। उनके अलौकिक तेज एवं प्रतिभा से प्रभावित होकर राजा ने उन्हें आचार्य पद पर प्रतिष्ठापित किया। इसका राज्यसभा में उपस्थित सभी संप्रदाय के आचार्यों ने अनुमोदन किया। आचार्य पद प्राप्त करने के बाद आपने तीन बार भारत भ्रमण कर शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्ग संप्रदाय का प्रचार कर शिष्य सृष्टि की अभिवृद्धि की। वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग का प्रतिपादन किया था। उन्होंने ही इस मार्ग पर चलने वालों के लिए वल्लभ संप्रदाय की आधारशिला रखी। पुष्टिमार्ग शुद्धाद्वैत दर्शन पर आधारित है। पुष्टिमार्ग में भक्त भगवान के स्वरूप दर्शन के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु के लिए प्रार्थना नहीं करता। वह आराध्य के प्रति आत्मसमर्पण करता है। इसको 'प्रेमलक्षणा भक्ति' भी कहते हैं। भागवत पुराण के अनुसार, 'भगवान का अनुग्रह ही पोषण या पुष्टि है।' वल्लभाचार्य ने इसी आधार पर पुष्टिमार्ग की अवधारणा दी। इसका मूल सूत्र उपनिषदों में पाया जाता है। कठोपनिषद में कहा गया है कि परमात्मा जिस पर अनुग्रह करता है, उसे अपना साक्षात्कार कराता है। वल्लभाचार्य ने प्रत्येक जीवात्मा को परमात्मा का अंश माना है। उनके अनुसार, परमात्मा ही जीव-आत्मा के रूप में संसार में छिटका हुआ है। यानी हर व्यक्ति परमात्मा का ही अंश है। इसी आधार पर वल्लभ ने किसी को भी कष्ट या प्रताड़ना देना अनुचित बताया है। कहा जाता है कि श्री वल्लभाचार्य एक बार भारत के उत्तर पश्चिम भाग की ओर बढ़ रहे थे और वहां उन्होंने गोवर्धन पर्वत के पास एक रहस्यमय घटना देखी। उन्होंने एक गाय देखी जो पर्वत में एक विशेष स्थान पर प्रतिदिन दूध बहाल कर रही थी। उस स्थान को खोदने पर, श्रीनाथजी की मूर्ति मिली जिसकी स्थापना की गई। इसलिए, ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने वल्लभचार्य को गले लगा लिया और श्रीनाथजी के रूप में उन्हें दर्शन दिया। वल्लभाचार्य को कुछ लोगों भगवान अग्नि का अवतार भी मानते हैं। वल्लभाचार्य के अनुयायी बाल कृष्ण की पूजा करते हैं।

श्री वल्लभाचार्य जयंती

वल्लाभाचार्य का दर्शन

वल्लभाचार्य का दर्शन अस्तित्व और अनस्तित्व की लड़ाई में न पड़कर संसार के खेल, का असली खिलाड़ी परमात्मा को बताता है। अपने इन सिद्धांतों की स्थापना के लिए वल्लभाचार्य ने तीन बार भारत का भ्रमण किया। यह यात्राएं सिद्धांतों के प्रचार के लिए थीं और करीब 19 वर्षों में पूरी हुई। प्रवास के समय वे भीड़-भाड़ से दूर एकांत में कहीं ठहरते थे। जहां-जहां वे ठहरे उन स्थानों को बैठक के नाम से जाना जाता है। यात्राओं के दौरान उन्होंने मथुरा, गोवर्धन आदि स्थानों में श्रीनाथजी की पूजा का इंतजाम किया और लोगों को निष्काम भक्ति के लिए प्रेरित किया। वल्लभाचार्य की 84 बैठक, 84 शिष्य और 84 ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। दूसरी यात्रा के समय उनका विवाह हुआ। विवाह के बाद वे प्रयाग के पास यमुना किनारे अडैल गांव में बस गए। गोपीनाथ और विट्ठलनाथ नाम से दो पुत्र हुए फिर वे वृन्दावन चले गए और कृष्ण की भक्ति में लीन रहे। संवत् 1556 में उनकी प्रेरणा से गिरिराज में श्रीनाथजी का विशाल मंदिर बनकर तैयार हुआ। मंदिर 20 साल में बनकर पूरा हुआ। महाप्रभु वल्लभाचार्य के संस्थापित पुष्टिमार्ग में कई भक्त कवि हुए हैं। महाकवि सूरदास, कुम्भनदास, परमानंददास, कृष्णदास आदि खास हैं। गोसाई विट्ठलदास ने पुष्टिमार्ग के इन आठ कवियों को अष्टछाप के रूप में सम्मानित किया है। वल्लभाचार्य की 84 बैठक, 84 शिष्य और 84 ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। इन ग्रन्थों के अलावा वल्लभाचार्य ने और भी अनेक ग्रन्थों और स्तोत्रों की रचना की। काशी के हनुमान घाट पर वल्लभाचार्यजी ने अपने दोनों पुत्रों गोपीनाथजी और विट्ठलनाथजी को अपने प्रमुख भक्त दामोदरदास हरसानी एवं अन्य वैष्णवजनों की उपस्थिति में अंतिम शिक्षा दी। फिर वह करीब 40 दिन तक निराहार रहे, मौन धारण कर लिया और आषाढ़ शुक्ल 3 संवत 1587 को जल समाधि ले ली।

वल्लभाचार्य जंयती उत्सव

वल्लभाचार्य जंयती उत्सव काफी हर्षोल्लास के साई मनाई जाती है। इस दिन मंदिरों को सुंदर तरीके से खूबसूरत फूलों के साथ सजाया जाता है। वल्लभाचार्य श्री कृष्ण के भक्त थे इसलिए भगवान कृष्ण का अभिषेक सुबह जल्दी उठकर किया जाता है। जिसके बाद भगवान कृष्ण की षोडश विधि से धूप, दीप नैवेध इत्यादि सहित पूजा की जाती है। भगवान कृष्ण की आरती की जाती है। भगवान कृष्ण के नाम के भजन और मंत्र पूरे दिन गाए जाते हैं। लोग भगवान कृष्ण की पूजा करते है। इस दिन विशेष प्रार्थनाएं चर्चाएं, उपदेश और यज्ञ आदि पूरे दिन आयोजित किए जाते है। भगवान कृष्ण की छवियों को एक रथ पर रखकर भव्य झांकी निकाली जाती है। श्री वल्लभाचार्य के अनुयायी सड़कों पर हर घर की ओर घूमते हैं। जिसके बाद भगवान कृष्ण के अंतिम मंगल अभिषेक को किया जाता है और प्रसाद मंदिर के अंदर सभी भक्तों को प्रदान किया जाता है। श्री वल्लभाचार्य के महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यों को इस दिन याद किया जाता है। उनकी प्रशंसा की जाती है। वल्लाभाचार्य द्वारा लिखित ग्रंख ब्रज और संस्कृत दोनों भाषाओं में उपलब्ध हैं। यह जयंती मूल रूप से वरुधनी एकादशी पर मनाई जाती है जो तमिल कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष पर और उत्तर भारतीय कैलेंडर अनुसार बैसाख माह के कृष्णा पक्ष में होती है। यह मुख्य रूप से हिंदुओं का त्यौहार है और देश के कई हिस्सों में विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, चेन्नई, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में मनाया जाता है। ऐसा कोई भी अनुष्ठान नहीं है जो इस दिन ना किया जाता हो। लोग पूरे दिन उपवास करते हैं हालांकि यह एक अनिवार्य नहीं है। इस दिन श्री वल्लभचार्य के लिए विशेष प्रार्थनाएं और मंत्र आयोजित किए जाते हैं। उनके उपदेश भक्तों के बीच लोकप्रिय भाषणों के माध्यम से सुने जातें है। लोग इस दिन को श्री वल्लभाचार्य और भगवान कृष्ण को पूर्णतः समर्पित कर हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। उनका आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।

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