भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई और भारत में हिंदूत्व का प्रचार-प्रसार करने का श्रेय क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को जाता है। सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विवादास्पद व्यक्तित्व रहे हैं। जहाँ बहुत से लोग उन्हें महान क्रांतिकारी व देशभक्त मानते हैं वहीँ ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो उन्हें सांप्रदायिक मानते हैं उन्हें महात्मा गाँधी की हत्या से जोड़ कर देखते हैं। सत्य जो भी हो तथ्य ये है कि हिन्दू राष्ट्र और हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का श्रेय सावरकर को ही जाता है। सावरकर को वीर सावरकर के नाम से जाना जाता है। वीर सावरकर जयंती विनायक दामोदर "वीर" सावरकर की याद में पूरे भारत में मनाई जाती है। वीर सावरकर को भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में से एक के रूप में जाना जाता है, सावरकर पूरे देश में हिंदू समुदाय के विकास के लिए कई गतिविधियों को करने के लिए जाने जाते हैं। वीर सावरकर जयंती प्रतिवर्ष 28 मई को मनाई जाती है। वीर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में हुआ था। सावरकर जयंती के तहत वीर सावरकर को उनके द्वारा किए गए महान कार्यों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर उन्हें याद किया जाता है। वीर सावरकर को मराठा कहानियों में जाति प्रथा को समाप्त करने का अग्रदूत माना जाता है। वीर सावरकर ने हमेशा सभी जातियों को एक समान समझने और भेदभाव मिटाने की भावना पर जोर दिया। वीर सावरकर की जयंती पर महारष्ट्र सहित पूरे भारत में कई भव्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उन्होंने हिंदुओं के पुनरुत्थान के लिए कई कार्य किए हैं। इस वर्ष वीर सावरकर जयंती 28 मई गुरुवार को मनाई जाएगी।

वीर सावरकर जयंती

जीवन परिचय

भारत स्वतंत्रता के अग्रदूत वीर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई सावरकर और पिता दामोदर पंत सावरकर थे। उनके माता-पिता राधाबाई और दामोदर पंत की चार संतानें थीं। वीर सावरकर के तीन भाई और एक बहन भी थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नासिक के शिवाजी स्कूल से हुयी थी। मात्र 9 साल की उम्र में हैजा बीमारी से उनकी मां का देहांत हो गया था जिसके कुछ वर्ष बाद ही उनके पिता की भी मृत्यु हो गई। घर परिवार की सारी जिम्मेदारी सावरकर के बड़े भाई गणेश पर आ गई। उनके बड़े भाई ने परिवार के भरण-पोषण का भार संभाला। सावरकर बचपन से ही बागी प्रवित्ति के थे। जब वे ग्यारह वर्ष के थे तभी उन्होंने ̔वानर सेना ̕नाम का समूह बनाया था। वे हाई स्कूल के दौरान बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किए गए ̔शिवाजी उत्सव ̕और ̔गणेश उत्सव ̕आयोजित किया करते थे। बाल गंगाधर तिलक को ही सवारकर अपना गुरु मानते थे। वर्ष 1901 मार्च में उनका विवाह ̔यमुनाबाई ̕ से हो गया था। वर्ष 1902 में उन्होंने स्नातक के लिए पुणे के ̔फग्र्युसन कॉलेज में दाखिला लिया। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण उनके स्नातक की शिक्षा का खर्च उनके ससुर यानी यमुनाबाई के पिता ने उठाया था। 1 फरवरी 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया था। 26 फरवरी 1966 को उन्होंने मुम्बई में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया और चिर निद्रा में लीन हो गए।

सावरकर का राजनैतिक जीवन

सावरकर बचपन से ही क्रांतिकारी थे। उनके ह्रदय में राष्ट्रभावना कूट-कूट के भरी थी। पुणे में उन्होंने ̔अभिनव भारत सोसाइटी ̕का गठन किया और बाद में स्वदेशी आंदोलन का भी हिस्सा बने। कुछ समय बाद वह तिलक के साथ ̔स्वराज दल ̕में शामिल हो गए। उनके देश भक्ति से ओप-प्रोत भाषण और स्वतंत्रता आंदोलन के गतिविधियों के कारण अंग्रेज सरकारने उनकी स्नातक की डिग्री ज़ब्त कर ली थी। वर्ष 1906 जून में बैरिस्टर बनने के लिए वे इंग्लैंड चले गए और वहां भारतीय छात्रों को भारत में हो रहे ब्रिटिश शासन के विरोध में एक जुट किया। उन्होंने वहीं पर ̔आजाद भारत सोसाइटी का गठन किया। सावरकर ने अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए हथियारों के इस्तेमाल की वकालत की थी और इंग्लैंड में ही हथियारों से लैस एक दल तैयार किया था। सावरकर द्वारा लिखे गए लेख ̔इंडियन सोशियोलाजिस्ट’ और ̔तलवार’̕ नामक पत्रिका में प्रकाशित होते थे। वे ऐसे लेखक थे जिनकी रचना के प्रकाशित होने के पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसी दौरान उनकी पुस्तक ̔द इंडियन वार ऑफ़ इंडिपेंडेंस 1857’ तैयार हो चुकी थी परंतु ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटेन और भारत में उसके प्रकाशित होने पर रोक लगा दी। कुछ समय बाद उनकी रचना मैडम भीकाजी की मदद से हॉलैंड में गुपचुप तरीके से प्रकाशित हुयी और इसकी प्रतियां फ्रांस पहुंची और फिर भारत भी पहुंचा दी गयीं। सावरकर ने इस पुस्तक में 1857 के ̔सिपाही विद्रोह' को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली लड़ाई बताया था। वर्ष 1909 में मदनलाल धिंगरा, सावरकर के सहयोगी, ने वायसराय, लार्ड कर्जन पर असफल हत्या के प्रयास के बाद सर विएली को गोली मार दी। उसी दौरान नासिक के तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर ए.एम.टी जैक्सन की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस हत्या के बाद सावरकर पूरी तरह ब्रिटिश सरकार के चंगुल में फंस चुके थे। उसी दौरान सावरकर को 13 मार्च 1910 को लंदन में कैद कर लिया गया।अदालत में उनपर गंभीर आरोप लगाये गए, और 50 साल की सजा सुनाई गयी। उनको काला पानी की सज़ा देकर अंडमान के सेलुलर जेलभेज दिया गया और लगभग 14 साल के बाद रिहा कर दिया गया। वहां पर उन्होंने कील और कोयले से कविताएं लिखीं और उनको याद कर लिया था। दस हजार पंक्तियों की कविता को जेल से छूटने के बाद उन्होंने दोबारा लिखा। वर्ष 1920 में महात्मा गाँधी, विट्ठलभाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक ने सावरकर को रिहा करने की मांग की। 2 मई 1921 में उनको रत्नागिरी जेल भेजा गया और वहां से सावरकर को यरवदा जेल भेज दिया गया। रत्नागिरी जेल में उन्होंने ̔हिंदुत्व पुस्तक ̕की रचना की। वर्ष 1924 में उनको रिहाई मिली मगर रिहाई की शर्तों के अनुसार उनको न तो रत्नागिरी से बाहर जाने की अनुमति थी और न ही वह पांच साल तक कोई राजनीति कार्य कर सकते थे। रिहा होने के बाद उन्होंने 23 जनवरी 1924 को ̔रत्नागिरी हिंदू सभा’ का गठन किया और भारतीय संस्कृति और समाज कल्याण के लिए काम करना शुरू किया। थोड़े समय बाद सावरकर तिलक की स्वराज पार्टी में शामिल हो गए और बाद में हिंदू महासभा नाम की एक अलग पार्टी बना ली। वर्ष 1937 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और आगे जाकर भारत छोड़ो आंदोलन’ ̕का हिस्सा भी बने। सावरकर ने पाकिस्तान निर्माण का विरोध किया और गांधीजी को ऐसा करने के लिए निवेदन किया। नाथूराम गोडसे ने उसी दौरान महात्मा गांधी की हत्या कर दी जिसमें सावरकर का भी नाम आया। सावरकर को एक बार फिर जेल जाना पड़ा परंतु साक्ष्यों के अभाव में उन्हें रिहा कर दिया गया। अपने जीवनकाल में सावरकर एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनको दो बार आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गयी थी। उनके द्वारा ही तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम दिया गया था। आजादी के बाद उनको 8 अक्टूबर 1951 में उनको पुणे विश्वविद्यालयन ने डी.लिट की उपाधि दी।

सावरकर के कार्य

वीर सावरकर ने समाज मे हिंदूत्व के प्रचार-प्रसार के लिए कई कार्य किए। 1897 की गर्मियों में महाराष्ट्र में प्लेग फैला हुआ था, जिसपर अंग्रेजी हुकूमत ध्यान नहीं दे रही थी। इस बात से क्षुब्ध हो कर दामोदर चापेकर ने ब्रिटिश ऑफिसर को गोली मार दी, जिस कारण उन्हें मौत की सजा दे दी गयी। इस घटना के बाद सावरकर ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रन्तिकारी गतिविधियाँ बढाने के लिए “मित्र मेला” का गठन किया। फर्ग्युसन कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने छात्रों को एकत्रित किया और स्वतंत्रता सेनानियों की फ़ौज खड़ी करने के लिए वर्ष 1904 में अभिनव भारत संगठन की स्थापना की। इस दौरान सावरकर ने क़ानून, इतिहास, और दर्शनशास्त्र से सम्बंधित कई किताबें पढ़ीं और व्यायामशालाओं में जाकर प्रशिक्षण भी लिया। इन्ही दिनों वे लोकमान्य तिलक से भारत की आज़ादी के लिए विचार-विमर्श भी किया करते थे। वर्ष 1905 बंगाल के विभाजन के विरोध में उन्होने विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी। वर्षों बाद महात्मा गाँधी ने भी स्वदेशी आन्दोलन में ऐसा ही किया था। इस घटना से कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन नाराज हो गया और सावरकर को डिसमिस कर दिया गया। पर बाकी छात्रों के दबाव और तिलक की अनुरोध पर उन्हें एग्जाम देने दिया गया और वे अच्छे नम्बरों से पास हुए। वीर सावरकर जब महज 12 साल के थे तभी अपने मित्रों के साथ मिल कर हिन्दू-मुस्लिम दंगों के दौरान अपने गाँव में स्थित मस्जिद को तोड़ने का प्रयास किया था। यह घटना कहीं न कहीं उनकी कट्टर सोच व मुस्लिमों के प्रति वैमनस्य को दर्शाती है। लेकिन कुछ इतिहासकार इसकी वजह मुस्लिम लड़कों द्वारा किये गए उत्पात को मानते हैं। ग्रेजुएशन करने के बाद तिलक जी के अनुमोदन पर उन्हें श्यामजी कृष्णवर्मा द्वारा स्कालरशिप प्रदान की गयी और वे बार-ऐट-लॉ की पढ़ाई करने के लिए लन्दन रवाना हो गए। भारत में मौजूद ब्रिटिश अधिकारियों ने लन्दन में इनपर विशेष नज़र रखने की सूचना भेजी। लन्दन में वे इंडिया हाउस में रहने लगे। वहां उनकी मुलाकात लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा, आदि छात्रों से हुई। सावरकर ने सभी को अभिनव भारत से जोड़ दिया। अपने लन्दन प्रावास के दौरान ही वर्ष 1908 में वीर सावरकर ने एक किताब भी लिखी थी, जिसका नाम था- “फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस”। हालांकि ब्रिटिश अधिकारीयों ने इसेजब्त कर लिया और किताब पब्लिश नहीं हो पायी। बैरिस्टर की परीक्षा पास कर लेने के बावजूद वीर सावरकर ने ओथ लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्होंने भारत पर ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार्य नहीं था। जब सावरकर पेरिस में थे तभी अभिनव भारत के एक सदस्य अनंत कन्हारे ने जैक्सन नामक एक ब्रिटिश ऑफिसियल की हत्या कर दी। अंग्रेजों ने इन हत्याओं के पीछे सावरकर को दोषी माना और जब 13 मई, 1910 को वे ब्रिटेन आये तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वीर सावरकर 13 मई, 1910 के दिन पेरिस से लंदन आये और आते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में बंद सावरकर ने जब सुना कि उन्हें जहाज द्वारा फ़्रांस के दुसरे सबसे बड़े शहर मार्सैय होते हुए भारत ले जाया जायेगा तो उन्होंने फ़ौरन फरार होने का एक प्लान बना लिया। उनका सोचना था कि फ़्रांस में शरण लेने से फ्रेंच सरकार उन्हें ब्रिटिश लॉ से बचा लेगी। जब उनका जहाज मार्सैय के तट पर पहुँचने वाला था तभी उन्होंने टॉयलेट जाने का बहाना किया और पोर्टहोल के स्क्रू खोल कर समुद्र में कूद गए और तैरते हुए तट के किनारे पहुँच गए। पर दुर्भाग्यवश फ्रेंच पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और पुनः अंग्रेजों के हवाले कर दिया। वीर सावरकर को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से ब्रिटिश सरकार ने एक नहीं दो-दो आजीवन कारावास यानि 50 साल की सजा दी थी। इस प्रकार की सजा एक ऐतिहासिक घटना थी। क्योंकि इससे पहेले कभी किसी व्यक्ति को दोहरे आजीवन कारावास की सज़ा नहीं सुनाई गयी थी। और सजा काटने के लिए जो जेल चुनी गयी थी वो थी अंडमान निकोबार आइलैंड की राजधानी में बनी हुई सेलुलर जेल। यह जेल काला पानी के नाम से कुख्यात थी। सेलुलर जेल में रखे गए कैदीयों से खूब काम कराया जाता था। उन्हे भर पेट खाना भी नहीं दिया जाता था। नारियल छील कर उसका तेल निकालना, जंगलों से लकड़ियाँ काटना, तेल निकालने की चक्कियों में कोल्हू के बैल की तरह मजदूरी करना और पहाड़ी क्षेत्रों में दुर्गम जगहों पर हुकुम के मुताबिक काम करना, यह सब कठिन काम वीर सावरकर को सेलुलर जेल के अन्य कैदीयों के साथ करने पड़ते थे। इसके अलावा छोटी-छोटी गलतियों पर कैदियों की खूब पिटाई की जाती आर काल कोठरी में कई-कई दिन तक भूखे प्यासे रखा जाता था। रिहा होने के कुछ दिनों बाद सावरकर ने 23 जनवरी 1924 को रत्नागिरी हिन्दू सभा का गठन किया जिसका उद्देश्य भारत की प्राचीन सभ्यता को बचाना और सामजिक कार्य करना था। उन्होंने हिंदी भाषा को देश भर में आम भाषा के रूप में अपनाने पर जोर दिया और दिया और हिन्दू धर्म में व्याप्त जाति भेद व छुआछूत को ख़त्म करने का आह्वान किया।

वीर सावरकर जयंती समारोह

वीर सावरकर जयंती के दिन, हिंदुओं के सभी संप्रदायों के लोग उनके साथ सम्मान के लिए एक साथ एकत्र होते हैं। उन्हें भारत माता के महान पुत्रों में से एक माना जाता है। ब्रिटिश अधिकारी देशबक्त सावरकर को चरमपंथी मानते थे। हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में सेवा करने के बाद, सावरकर भी हिंदुत्व विचारधारा के साथ आक्रामक बन गए। उन्होंने भविष्य के भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में वकालत की। भारत भर में कट्टर हिंदुओं द्वारा वीर सावरकर जयंती को महान उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोग इस महान हिंदुत्व संस्थापक को उच्च सम्मान देते हैं। हिंदू महासभा के कार्यकर्ता सावरकर जयंतू परक गरीबों को दान-पुण्य करते हैं। लोगों में मीठाई बाटीं जाती है अपने हिंदुत्वु के जनत के जयंती पर हर्षोल्लास के साथ उनकी प्रतिमाओं पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। इस दिन कई समाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। समाज में हिंदुओं की भलाई एवं उनके उत्थान के लिए कई योजनाएं बनाई जाती हैं। सावरकर एक प्रख्यात समाज सुधारक थे। उनका दृढ़ विश्वास था, कि सामाजिक एवं सार्वजनिक सुधार बराबरी का महत्त्व रखते हैं व एक दूसरे के पूरक हैं। उनके समय में समाज बहुत सी कुरीतियों और बेड़ियों के बंधनों में जकड़ा हुआ था। इस कारण हिन्दू समाज बहुत ही दुर्बल हो गया था। अपने भाषणों, लेखों व कृत्यों से इन्होंने समाज सुधार के निरंतर प्रयास किए। उनके सामाजिक उत्थान कार्यक्रम ना केवल हिन्दुओं के लिए बल्कि राष्ट्र को समर्पित होते थे हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सावरकर के अनुयायी इसका अनुसरण करते हैं। कई बडे नेता भी वीर सावरकर को उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को प्रति धन्यवाद ज्ञापन कर पुष्पांजिल अर्पित करते हैं।

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