बड़ी बड़ी बिल्डिंगों के जिन एसी कमरों के बीच हम बैठ कर काम करते हैं, उनके बारे में हम कितना जानते हैं? बस यही कि इन्हें इंजीनियरों और मजदूरों ने बनाया है, लेकिन कभी सोचा है कि पत्थर को सीमेंट में रखना है या मिट्टी खोद कर ही घर की नींव होनी चाहिये, लकड़ी काटने के लिये दांतेदार आरी चाहिये, ये किसने सोचा होगा। ये पृथ्वी, पहाड़, नदी, पेड़ किसने बनाए? किसने सोचा होगा कि महासागर में खारा पानी होगा और धरती पर ऑक्सीजन होगी ताकि जीव-जंतु पनप सके? इन सब के रचयिता हैं भगवान विश्वकर्मा। धरती पर बनी रावण की लंका से लेकर स्वर्ग पर इंद्र का सिंहासन, पाताल लोक कि कंद्राएं हों या पांडवों की राजधानी, सब का निर्माण बाबा विश्वकर्मा ने ही किया है। विश्वकर्मा औजारों के भी देवता हैं। कहा जाता है कि प्राचीन काल में जितनी राजधानियां थी, प्राय: सभी विश्वकर्मा की ही बनाई कही जाती हैं। यहां तक कि सतयुग का 'स्वर्ग लोक', त्रेता युग की 'लंका', द्वापर की 'द्वारिका' और कलयुग का 'हस्तिनापुर' आदि विश्वकर्मा द्वारा ही रचित हैं। 'सुदामापुरी' की तत्क्षण रचना के बारे में भी यह कहा जाता है कि उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे। इससे यह आशय लगाया जाता है कि धन-धान्य और सुख-समृद्धि की अभिलाषा रखने वाले पुरुषों को बाबा विश्वकर्मा की पूजा करना आवश्यक और मंगलदायी है।

भगवान विश्वकर्मा कथा

 
कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा के पुत्र  “धर्म” का विवाह “वस्तु” से हुआ। इन दोनों के 7 पुत्र जन्मे। 7वां जो पुत्र था उनका नाम “वास्तु” रखा गया। वास्तु का आगे विवाह हुआ और विवाह उपरांत एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम रखा गया “विश्वकर्मा”। जिन्होंने आगे चल कर पूरे संसार को आकृति दी। सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम 'नारायण' अर्थात साक्षात विष्णु भगवान सागर में शेषशय्या पर प्रकट हुए। उनके नाभि-कमल से चर्तुमुख ब्रह्मा दृष्टिगोचर हो रहे थे। ब्रह्मा के पुत्र 'धर्म' तथा धर्म के पुत्र 'वास्तुदेव' हुए। कहा जाता है कि धर्म की 'वस्तु' नामक स्त्री से उत्पन्न 'वास्तु' सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की 'अंगिरसी' नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए। पिता की भांति विश्वकर्मा भी वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने।

किस्सा

भगवान विश्वकर्मा की महत्ता स्थापित करने वाली एक कथा है। इसके अनुसार वाराणसी में धार्मिक व्यवहार से चलने वाला एक रथकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। अपने कार्य में निपुण था, परंतु विभिन्न जगहों पर घूम-घूम कर प्रयत्न करने पर भी भोजन से अधिक धन नहीं प्राप्त कर पाता था। पति की तरह पत्नी भी पुत्र न होने के कारण चिंतित रहती थी। पुत्र प्राप्ति के लिए वे साधु-संतों के यहां जाते थे, लेकिन यह इच्छा उसकी पूरी न हो सकी। तब एक पड़ोसी ब्राह्मण ने रथकार की पत्नी से कहा कि तुम भगवान विश्वकर्मा की शरण में जाओ, तुम्हारी इच्छा पूरी होगी और अमावस्या तिथि को व्रत कर भगवान विश्वकर्मा महात्म्य को सुनो। इसके बाद रथकार एवं उसकी पत्नी ने अमावस्या को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की, जिससे उसे धन-धान्य और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और वे सुखी जीवन व्यतीत करने लगे। उत्तर भारत में इस पूजा का काफी महत्व है।

 

विश्वकर्मा पूजा विधि

-सुबह जल्दी उठ कर स्नान करें
-पूजा स्थल पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा रखें
-अपने औजार भी पूजा स्थान पर रखें
-कलश जल भी पूजा स्थान पर रखें
-विश्वकर्मा प्रतिमा पर पुष्प चढ़ा कर धूप और दीप जलाएं
-औजारों को धूप लगाएं और तिलक लगाएं
-प्रसाद का भोग लगाएं
-हाथ में पुष्प और अक्षत लेकर विश्वकर्मा का ध्यान करें
-हवन के बाद प्रसाद बांटें

विश्वकर्मा पूजा मंत्र

विश्वकर्मा पूजा के समय इस मंत्र का जाप करना चाहिए:
ओम आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम:
ओम अनन्तम नम:, पृथिव्यै नम:

विश्वकर्मा पूजा फल

भगवान विश्वकर्मा की पूजा जो भी सच्चे दिन से करता है, उनका बेड़ा पार हो जाता है। कारोबार में कभी घाटा नहीं होता बल्कि रोज के रोज व्यापार बढ़ता जाता है। नौकरी में मान सम्मान मिलता है। घर में धन सम्पदा कि कोई कमी नहीं रहती। सारा जीवन सुखी हो जाता है।भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूप बताए जाते हैं- दो बाहु वाले, चार बाहु एवं दस बाहु वाले तथा एक मुख, चार मुख एवं पंचमुख वाले। उनके मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ नामक पांच पुत्र हैं। यह भी मान्यता है कि ये पांचों वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे और उन्होंने कई वस्तुओं का आविष्कार किया। इस प्रसंग में मनु को लोहे से, तो मय को लकड़ी, त्वष्टा को कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और दैवज्ञ को सोने-चांदी से जोड़ा जाता है।

विश्वकर्मा आरती


ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा ॥1॥

 

आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया।
शिल्प शस्त्र का जग में, ज्ञान विकास किया ॥2॥

 
ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नही पाई।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥3॥
 

रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना।
संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना॥4॥ 

जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी॥5॥
 

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज, सकल रूप साजे॥6॥ 


ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे।
मन दुविधा मिट जावे, अटल शांति पावे॥7॥

 
श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥8॥ 

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आप सभी को भगवान विश्वकर्मा पूजा की बधाई। बोलो भगवान श्री विश्वकर्मा की.. जय।।
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