भारतवर्ष में हर महीने में 2 एकादशियां होती है एक शुक्ल पक्ष की और एक कृष्ण पक्ष की। दोमास मिलाकर कुल मिलाकर 26 एकादशियां होती हैं। इन सभी एकादशियों में से योगिनी एकादशी की अत्यंत महिमा है। इसे पाप से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी भी कहते हैं। योगिनी एकादशी हिंदुओं के लिए पिछले सभी पापों को दूर करने और भविष्य में अपने जीवन को अधिक प्रभावी तरीके से शुद्ध रुप से संचालित करने के अवसरों में से एक है। यह दिन उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो भौतिकवाद के प्रति आकर्षित हैं जिन्हें आध्यात्मिकता के मार्ग की ओर अग्रसर होने की आवश्यकता है। यह एकादशी शरीर के साथ-साथ मन को शुद्ध कर मुक्ति प्रदान करने वाली भी है। इस एकादशी को करने से बड़े से बड़े पाप कर्म से भी छुटकारा मिल जाता है। इसे सबसे पवित्र उत्सवों के रुप में देखा जाता है। यह दिन बहुत पवित्र और प्रतिष्ठित होता है। योगिनी एकादशी व्रत कथा, उपवास और इसके द्वारा प्राप्त किए गए अत्यधिक लाभों के महत्व को दर्शाती है। योगिनी एकादशी आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष के 11वें दिन होती है। इस दिन भगवान विष्णु का अनुसरण किया जाता है। इस बार योगिनी एकादशी 17 जून को मनाई जाएगी।

योगिनी एकादशी व्रत

योगिनी एकादशी व्रत कथा
योगिनी एकादशी व्रत करने के पीछे एक कहानी छिपी है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठर को सुनाई थी कि स्वर्ग में अलकापुरी नामक एक नगरी में धन के देवता कुबेर का राज था, वह वहां के राजा थे। कुबेर बहुत बड़े शिव भक्त थे वह प्रतिदिन नियमित रुप से शिव की पूजा किया करते थे। वह शिव को रोज़ाना फूल अर्पित करते थे। हेम नाम का माली पूजन के लिए उनके यहां फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नामक एक सुंदर पत्नी थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन पत्नी के साथ भोग विलास करने के कारण वह फूल राजा को देना भूल गया और अपनी स्त्री के साथ रमण करने लगा। इधर राजा उसकी दोपहर तक राह देखते रहे। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि जाओ और जाकर माली के न आने का कारण पता करो। इस पर सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी अतिकामी है, अपनी स्त्री के साथ हास्य-विनोद और रमण कर रहा होगा। यह सुनकर कुबेर क्रोधित हो गए और माली को अपने पास बुलाया। हेम माली राजा के भय से काँपता हुआ दरबार में ‍उपस्थित हुआ। राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा- ‘तू बहुत पापी है तूने अपने भोग विलास के चलते मेरे पूजा के नियम को तोड़ा है इसलिए मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होगा।’

कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गया। धरती पर आते ही उसका शरीर कोढ़ी हो गया। उसकी स्त्री भी गायब हो गई। मृत्युलोक में आकर माली ने महान दु:ख भोगा, भयानक जंगल में जाकर बिना अन्न और जल के भटकता रहा। सोना, खाना सब त्याग दिया। अचानक भटकते-भटकते एक दिन वह मार्कंण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँच गया। हेम माली वहाँ जाकर उनके पैरों में गिर गया। उसे देखकर मारर्कंडेय ऋषि बोले तुमने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके प्रभाव से यह हालत हो गई। हेम माली ने सारा वृत्तांत कह ‍सुनाया। यह सुनकर ऋषि बोले- निश्चित ही तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए तेरे उद्धार के लिए मैं एक व्रत बताता हूँ। यदि तू अषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सब पाप नष्ट हो जाएँगे। यह सुनकर हेम माली बहुत खुश हुआ उसने ऋषि को प्रणाम किया और विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। जिसके फलस्वरुप इस व्रत के प्रभाव से उसके सारे पाप, सारे कष्ट दूर हो गए और वह अपने पुराने स्वरूप में आकर अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।

योगिनी एकादशी व्रत का महत्व
श्रीकृष्ण ने कहा है कि योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है। इसके व्रत से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अंत में स्वर्ग प्राप्त होता है। जो लोग इस दिन उपवास करते हैं वे सफल तरीके से अपनी समस्याओं को दूर करने में सक्षम होंते हैं। वह लोग अपने पिछले पापों को शुद्ध करने के साथ, किसी भी समस्या का सामना किए बिना सामान्य जीवन जी पाते है। बिना किसी दर्द पीड़ा के व्यक्ति खुशहाल जीवन जीता है।

व्रत एवं पूजन विधि
एकादशी से एक दिन पूर्व यानि दशमी के दिन सच्चे भाव से एकादशी व्रत का संकल्प करना चाहिए। फिर एकादशी वाले दिन स्नान आदि क्रियाओं से निवृत्त होकर भगवान श्री लक्ष्मी नारायण जी के समक्ष उनका धूप, दीप, नेवैध, फूल एवं फलों सहित पवित्र भाव से पूजन करना चाहिए। सारा दिन अन्न का सेवन किए बिना सत्कर्म में अपना समय बिताना चाहिए। साथ ही जरुरतमंदो को दान करना चाहिए। इस व्रत में दान की अत्यंत महिमा होती है। व्रत में केवल फलाहार का विधान है। रात को मंदिर में दीपदान करके प्रभु के नाम का संकीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिए। फिर अगले दिन स्नान आदि कर के दान करना चाहिए जिसके बाद उपवास शर्बत पीकर तोड़ना चाहिए।

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