हिन्दू मान्यतानुसार हर माह में 2 एकादशियां होती हैं। इस तरह पूरे साल में दो मास के साथ 25 एकादशी होती है। जो प्रत्येक माह की कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष के 11 वें दिन होती है। प्रत्येक एकादशी की बड़ी महिमा होती है। एकादशी के दिन भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं,। भक्तों का मानना है कि एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और सभी पापों को क्षमा कर सुख-शांति प्रदान करते हैं। इसी कारणवश एकादशी का व्रत किया जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी कई मायनों में खास होती है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है। यह हिंदू संवत्सर की पहली एकादशी होती है। यह बहुत ही फलदायी होती है इसलिये इसे फलदा एकादशी भी कहते हैं, मान्यता है कि कामदा एकादशी का व्रत रखने व्रती को प्रेत योनि से भी मुक्ति मिल सकती है। कामदा एकादशी की पूर्व संध्या पर, भक्त 'सात्विक' भोजन खाते हैं, जिसका अर्थ है सरल और पूरी तरह से शाकाहारी भोजन। हिन्दू धर्म के लोग मंत्र का उच्चारण कर भगवान का गुणगान करते हैं। इस वर्ष कामदा एकादशी 04 अप्रैल (शनिवार) को मनाई जाएगी।

कामदा एकादशी


कामदा एकादशी व्रत कथा

कामदा एकादशी को करने के पीछे कई मान्यताएं है। विभिन्न पुराणों के अनुसार, दोनों प्रकार के एकादशी के दौरान उपवास अनिवार्य माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने 'बैंकुठ' के दरवाजे खोले थे और जिसमें दो राक्षसों ने प्रवेश किया था। उन राक्षसों ने वरदान मांगा था कि बैकुंठ का द्वार उन सभी के लिए भी खोला जाना चाहिए जो इस दिन पर साफ मन से प्रार्थना, जप-तप करेंगे। भगवान विष्णु ने उनकी बात मान ली। ऐसा कहा जाता है कि जो लोग कामदा एकादशी की पूजा करेंगे वे खुद को जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्त पाएगें। उनके सारे बुरे कर्म नष्ट हो जाएगें और वो सीधा बैंकुठ को प्राप्त करेंगे।
वहीं इसकी दूसरी कथा है श्री कृष्ण से धर्मराज युधिष्ठिर ने इस कथा को सुनाने का आग्रह किया था तो कृष्ण ने उन्हें कामदा एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा प्राचीनकाल में भोगीपुर नामक एक नगर था। वहां पर अनेक ऐश्वर्यों से युक्त पुण्डरीक नाम का एक राजा राज्य करता था। भोगीपुर नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर तथा गंधर्व वास करते थे। उनमें से एक जगह ललिता और ललित नाम के दो स्त्री-पुरुष अत्यंत वैभवशाली घर में निवास करते थे। उन दोनों में अत्यंत स्नेह था, यहां तक कि अलग-अलग हो जाने पर दोनों व्याकुल हो जाते थे। एक समय पुण्डरीक की सभा में अन्य गंधर्वों सहित ललित भी गान कर रहा था। गाते-गाते उसको अपनी प्रिय ललिता का ध्यान आ गया और उसका स्वर भंग होने के कारण गाने का स्वरूप बिगड़ गया। ललित के मन के भाव जानकर कार्कोट नामक नाग ने पद भंग होने का कारण राजा से कह दिया। पुण्डरीक ने क्रोधपूर्वक होकर ललीत को श्राप दे दिया कि तु पत्नी वियोग सहेगा और राक्षस बन कर मांस खाएगा। पुण्डरीक के श्राप से ललित उसी क्षण महाकाय विशाल राक्षस हो गया। जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह वृत्तांत मालूम हुआ तो उसे अत्यंत खेद हुआ और वह अपने पति के उद्धार का यत्न सोचने लगी। वह राक्षस अनेक प्रकार के घोर दुःख सहता हुआ घने वनों में रहने लगा। उसकी स्त्री विलाप करती रहती। एक बार ललिता अपने पति के पीछे घूमती-घूमती विन्ध्याचल पर्वत पर पहुंच गई, जहां पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। ललिता शीघ्र ही श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गई और वहां जाकर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी। और उन्हें सारा वृतांत सुनाने लगी। सारी बाते सुन कर श्रृंगी ऋषि बोले कि अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं। यदि तू कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दे तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी अवश्यमेव शांत हो जाएगा। मुनि के ऐसे वचन सुनकर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी आने पर उसका व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करने लगी- हे प्रभो! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पतिदेव को प्राप्त हो जाए जिससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाए। एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ। फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा। उसके पश्चात वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक को चले गए। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से समस्त पाप नाश हो जाते हैं तथा राक्षस आदि की योनि भी छूट जाती है। संसार में इसके बराबर कोई और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

कामदा एकादशी व्रत की पूजा विधि

कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। इस दिन तड़के सुबह उठकर पवित्र नदियों या किसी तीर्थ स्थाान में स्नाणन करना अच्छा् माना जाता है। अगर ऐसा करना मुमकिन न हो तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगा जल छिड़क कर स्नाअन करना भी शुभ होता है। नहाने के बाद भगवान विष्णु का फल, फूल, दूध, पंचामृत और तिल से पूजन करें। तत्प श्चा त सत्य नारायण की कथा पढ़ें। कामदा एकादशी का व्रत रखने वाले भक्तत को इस दिन अनाज ग्रहण नहीं करना चाहिए। अगले दिन ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद व्रत का पारण करना चाहिए। शास्त्रों का कहना है कि जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें सदाचार का पालन करना चाहिए। जो यह व्रत नहीं भी करते हैं उन्हें भी इस दिन लहसुन, प्याज, बैंगन, मांस-मदिरा, पान-सुपारी और तंबाकू से परहेज रखना चाहिए। व्रत रखने वाले को दशमी तिथि के दिन से ही मन में भगवान विष्णु का ध्यान शुरू कर देना चाहिए और काम भाव, भोग विलास से खुद को दूर कर लेना चाहिए तथा मूली, मसूरदाल के सेवन से परहेज रखना चाहिए। कामदा एकादशी जिसे फलदा एकादशी भी कहते हैं, श्री विष्णु का उत्तम व्रत कहा गया है। इस व्रत के पुण्य से जीवात्मा को पाप से मुक्ति मिलती है। यह एकादशी कष्टों का निवारण करने वाली और मनोनुकूल फल देने वाली होने के कारण फलदा और कामना पूर्ण करने वाली होने से कामदा कही जाती है।

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