इस धरती पर कई देवताओं नें मनुष्यों और पशु-पक्षियों का रुप धारण कर जन्म लिया है। जिनका उद्देश्य धरती पर हो रहे पाप का विनाश करना रहा है। ऐसे ही हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति दिखाने व उनकी सेवा करने के उद्देश्य से हनुमान के रुप में इस धरती पर जन्म लिया। श्री हनुमान को शक्ति एवं ज्ञान का देवता माना जाता है। उनमें अद्म साहस और बल था। वो ज्ञानियों के ज्ञानी थे। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार उन्हें भगवान राम के 'परम भक्त' के रूप में भी जाना जाता है। हनुमान भगवान शिव का ही रुद्र अवतार है। भगवान हनुमान का जन्म चैत्र माह की शुक्ल 15 वें दिन यानि पूर्णिमा को हुआ था। उनके पिता का नाम केसरी एवं माता का नाम अंजनी था। हनुमान को पवन देवता का पुत्र भी माना जाता है। उन्हें पवनपुत्र हनुमान, केसरी नंदर, अंजनी पुत्र भी कहा जाता है। भगवान हनुमान से बढ़कर कोई भक्त इस धरती पर नहीं हुआ है। उन्होंने भगवान राम के प्रमुख भक्त की भूमिका अदा करते करते राम के परम भक्त हनुमान के रुप में भी पहचाना जाता है। रामायण के पांचवें खंड में सुंदरकांड के रुप में हनुमान और उनकी भक्ति के बारे में पूर्णतः वर्णित है। सुन्दकांड का पूरा खंड ही हनुमान की महिमा का बखान करता है। भगवान हनुमान के जन्मदिवस को हनुमान जयंती के रुप में पूरे भारतवर्ष में बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र में, यह हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने की पूर्णिमा को मनाया जाती है। यद्यपि, अन्य हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, यह अश्विन माह के अंधेरे पक्ष में 14वें दिन पड़ती है। तमिलानाडु और केरल में, यह मार्गशीर्ष माह (दिसम्बर और जनवरी के बीच में) में, इस विश्वास के साथ मनाई जाती है कि, भगवान हनुमान इस महीने की अमावस्या को पैदा हुए थे। उड़ीसा में, यह वैशाख (अप्रैल) महीने के पहले दिन मनाई जाती है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में यह वैशाख महीने केक 10वें दिन मनाई जाती है, जो चैत्र पूर्णिमा से शुरु होती है और वैशाख महीने के 10वें दिन कृष्ण पक्ष पर खत्म होती है। इस वर्ष हनुमान जयंती 19 अप्रैल को मनाई जाएगी।

हनुमान जयंती

हनुमान के जीवन से जुड़ी कथाएं

श्री राम के भक्त हनुमान जे जीवन से जुड़ी कई प्रथाएं प्रचलित है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के वक्त भगवान विष्णु का मोहिनी रुप देखकर भगवान शिव अपना वीर्य खो बैठे थे उनके वीर्य के कण को ही माता अंजनी के गर्भ में भगवान विष्णु ने डाल दिया था। जिससे शिव का अवतार हनुमान के रुप में धरती पर हुआ। वहीं ऐसा भी कहा जाता है कि जन्म लेते ही हनुमान को बहुत भूख लगी थी और वो सूर्य को फल समझ कर उसे खाने के लिए आकाश में चल दिए। सूर्य के निकट आता देख इन्द्र को लगा कि वह राहू है जो उन्हें खत्म करने आया है। हनुमान ने सूर्य को अपने मुंह में निगल लिया तभी इन्द्र ने उन पर वज्र से प्रहार किया और हनुमान मूर्छित होकर नीचे गिर पढ़े। उन्हें मूर्छित अवस्था में देख पवन देव को क्रोध आ गाया और उन्होंने सारी सृष्टि की हवा ही बंद कर दी। जिससे कई जीव जन्तु मरने लगे। जब सभी देवी-देवताओं ने पवन देव से प्रार्थना की और हनुमान को होश आया तब उन्होनें धरती पर हवा का संचार किया। जिसके बाद से हनुमान को पवन पुत्र कहा जाने लगा। हनुमान की राम के प्रति भक्ति किसी से छिपी नहीं है। सीता को रावण से छुड़ाने के लिए हनुमान ने अहम भूमिका अदा की है। उन्होंने संजीवनी बूटी लाने के लिए पूरे पर्वत को ही उठा लिया था। हनुमान को वीर, साहसी, निडर माना जाता है कहा जाता है कि भूत पिशाच निकट नहीं आवे महावीर जब नाम सुनावे। अर्थात जहां हनुमान का नाम होता हैं वहां भूत-पिशाच, राहु केतु, शनि का प्रकोप नहीं होता। सभी बुरी शक्तियां हनुमान के नाम से ही डरती हैं। तभी तो किसी भी तरह की बुरी शक्ति से पीड़ित व्यक्ति को हनुमान जी के मंदिर लाया जाता है। उनकी महिमा अपरमपार है।

हनुमान जयंती का महत्व

भक्तों के लिए हनुमान जयंती का खास महत्वक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी को अजेय- अमर होने का वरदान प्राप्त है। कहा जाता है कि एक बार माता सीता अपनी मांग में सिंदूर लगा रहीं थी। तभी हनुमान ने पूछा कि माते इससे क्या होता है। सीता माता ने कहा कि यह सिंदूर मेरे स्वामी की लंबी उम्र के लिए है। इसके बाद अपने प्रभु श्रीराम के लिए हनुमान ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया। जिसे देख सीता माता प्रसन्न हुई और उन्हें अमर होने का वरदान दे दिया। तभी से हनुमान को सिंदूर लगाना काफी शुद्ध माना जाता है। उन्हें सिंदूर का चौला अर्पित करने से वह बहुत प्रसन्न होते हैं। संकटमोचन हनुमान को प्रसन्न करने के लिए भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और हनुमान चालीसा का पाठ करते है। मान्यरता है कि इस दिन पांच या 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने से पवन पुत्र हनुमान प्रसन्नक होकर भक्तोंह पर कृपा बरसाते हैं। इस मौके पर मंदिरों में विशेष पूजा-पाठ का आयोजन होता है। घरों और मंदिरों में भजन-कीर्तन होते हैं। हनुमान जी को प्रसन्ने करने के लिए सिंदूर चढ़ाया जाता है और सुंदर कांड का पाठ करने का भी प्रावधान है। शाम की आरती के बाद भक्तों में प्रसाद वितरित करते हुए सभी के लिए मंगल कामना की जाती है। श्री हनुमान जयंती में कई जगहों पर मेला भी लगता है।

हनुमान जयंती उत्सव

हनुमान जयंती को दुनिया भर के हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है। हनुमान जयंती समारोह सभी हनुमान मंदिरों में होते हैं। सभी जगहों के मंदिरों को बहुत सुंदर तरीके से फूल और लाइटों के जरिए सजाया जाता है। भक्त प्रसाद, फूल और नारियल आदि के मंदिरों में जाते हैं। वे हनुमान चालिसा और आरती का जप करके प्रार्थनाएं करते हैं। हनुमान जयंती का मुख्य उत्सव सलासर मंदिर में होता है जो कि राजस्थान के चुरु जिले में स्थित है। सीकर शहर से करीब 55 किलोमीटर दूर है। इस दिन यहां एक बड़ा मेला लगता है। दुनिया भर से लाखों भक्त इस दिन सलासर मंदरि में हनुमान जी के दर्शन करने आते हैं। गेहूं के आटे, चीनी और घी आदि से बने राजस्थानी पकवान, लड्डू, बुंदी और पेड़े को प्रसाद के रुप में चढ़ाया जाता है।। हनुमान जी अपने भक्तों के बीच में बहुत से नामों से जाने जाते हैं; जैसे- बजरंगवली, पवनसुत, पवन कुमार, महावीर, बालीबिमा, मारुतसुत, संकट मोचन, अंजनिसुत, मारुति, आदि नाम प्रचलित है।

हनुमान जयंती पूजा विधि

हनुमान जयंती को पूरे भारत में बड़े ही उल्लासपूर्ण और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन न सिर्फ हनुमानजी की पूजा होती है बल्कि श्रीराम और सीताजी का भी पूजन-स्मरण होता है क्योंकि हनुमान राम के बड़े भक्त थे। व्रत की पूर्व रात्रि को जमीन पर सोने से पहले भगवान राम और माता सीता के साथ-साथ हनुमानजी का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद यदि इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन कर सके तो बेहतर होता है। प्रात: जल्दी उठकर दोबार राम-सीता एवं हनुमानजी को याद करना चाहिए। सुबह जल्दी उठकर स्नान व ध्यान कर हाथ में गंगाजल लेकर व्रत का संकल्प करना चाहिए। साफ-स्वच्छ वस्त्रों में पूर्व दिशा की ओर भगवान हनुमानजी की प्रतिमा को स्थापित करनी चाहिए। विनम्र भाव से बजरंग बली की प्रार्थना करनी चाहिए। इसके पश्चात षोडशोपचार की विधि-विधान से श्री हनुमानजी की आराधना करें। हनुमानजी की पूजा में हनुमत कवच मंत्र का जाप अवश्य करें। कवच मंत्र का जाप तुरंत फलदायी होता है। इससे उनका आशीर्वाद मिलता है। साथ ही हनुमान चालिसा व उनकी आरती करनी चाहिए। माना जाता है कि हनुमान जी ब्रहमचारी थे इसलिए स्त्रियों को उन्हें स्पर्श नहीं करना चाहिए।

श्री हनुमान चालीसा

दोहा:
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि।
बरनऊँ रघुवर विमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानि के, सुमिरौ पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार।।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवन सुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी।
कंचन वरन विराज सुबेसा, कान्न कुण्डल कुंचित केसा।।
हाथ ब्रज औ ध्वजा विराजे, कान्धे मूंज जनेऊ साजे।
शंकर सुमन केसरी नन्दन, तेज प्रताप महा जग वन्दन।।
विद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिवे को आतुर।
प्रभु चरित्र सुनिवे को रसिया, राम-लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियंहि दिखावा, विकट रूप धरि लंक जरावा।
भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज सवारे।।
लाए संजीवन लखन जियाए, श्री रघुबीर हरषि उर लाए।
रघुपति कीन्हि बहुत बठाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावें, अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावें।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद सारद सहित अहीसा।।
यम कुबेर दिगपाल कहाँ ते, कवि कोबिद कहि सके कहाँ ते।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना।
जुग सहस्र जोजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानु।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख मांहि, जलधि लाँघ गये अचरज नाहिं।
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुलारे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे।
सब सुख लहे तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहूँ को डरना।।
आपन तेज सम्हारो आपे, तीनों लोक हाँक ते काँपे।
भूत पिशाच निकट नहीं आवें, महावीर जब नाम सुनावें।।
नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत वीरा।
संकट ते हनुमान छुड़ावें, मन क्रम वचन ध्यान जो लावें।।
सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावे, सोई अमित जीवन फल पावे।।
चारों जुग परताप तुम्हारा, है प्रसिद्ध जगत उजियारा।
साधु संत के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन्ह जानकी माता।
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावें, जनम जनम के दुख विसरावें।
अन्त काल रघुवर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।
संकट कटे मिटे सब पीरा, जपत निरन्तर हनुमत बलवीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरुदेव की नाईं।
जो सत बार पाठ कर कोई, छूटई बन्दि महासुख होई।।
जो यह पाठ पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा।
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा।।
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

हनुमान जी की आरती

आरती किजे हनुमान लला की| दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरवर काँपे | रोग दोष जाके निकट ना झाँके ॥
अंजनी पुत्र महा बलदाई| संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे वीरा रघुनाथ पठाए| लंका जाए सिया सुधी लाए॥
लंका सा कोट समुंद्र सी खाई| जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जाई असुर संहारे| सियाराम जी के काज सँवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पडे सकारे| लानि संजिवन प्राण उबारे॥
पैठि पताल तोरि जम कारे| अहिरावन की भुजा उखारे॥
बायें भुजा असुर दल मारे| दाहीने भुजा सब संत जन उबारे॥
सुर नर मुनि जन आरती उतारे| जै जै जै हनुमान उचारे॥
कचंन थाल कपूर लौ छाई| आरती करत अंजना माई॥
जो हनुमान जी की आरती गावे| बसहिं बैकुंठ परम पद पावें॥
लंका विध्वंश किए रघुराई| तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई॥
आरती किजे हनुमान लला की| दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

हनुमान जी के 108 नाम

1.आंजनेया : अंजना का पुत्र
2.महावीर : सबसे बहादुर
3.हनूमत : जिसके गाल फुले हुए हैं
4.मारुतात्मज : पवन देव के लिए रत्न जैसे प्रिय
5.तत्वज्ञानप्रद : बुद्धि देने वाले
6.सीतादेविमुद्राप्रदायक : सीता की अंगूठी भगवान राम को देने वाले
7.अशोकवनकाच्छेत्रे : अशोक बाग का विनाश करने वाले
8.सर्वमायाविभंजन : छल के विनाशक
9.सर्वबन्धविमोक्त्रे : मोह को दूर करने वाले
10.रक्षोविध्वंसकारक : राक्षसों का वध करने वाले
11.परविद्या परिहार : दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले
12.परशौर्य विनाशन : शत्रु के शौर्य को खंडित करने वाले
13.परमन्त्र निराकर्त्रे : राम नाम का जाप करने वाले
14.परयन्त्र प्रभेदक : दुश्मनों के उद्देश्य को नष्ट करने वाले
15.सर्वग्रह विनाशी : ग्रहों के बुरे प्रभावों को खत्म करने वाले
16.भीमसेन सहायकृथे : भीम के सहायक
17.सर्वदुखः हरा : दुखों को दूर करने वाले
18.सर्वलोकचारिणे : सभी जगह वास करने वाले
19.मनोजवाय : जिसकी हवा जैसी गति है
20.पारिजात द्रुमूलस्थ : प्राजक्ता पेड़ के नीचे वास करने वाले
21.सर्वमन्त्र स्वरूपवते : सभी मंत्रों के स्वामी
22.सर्वतन्त्र स्वरूपिणे : सभी मंत्रों और भजन का आकार जैसा
23.सर्वयन्त्रात्मक : सभी यंत्रों में वास करने वाले
24.कपीश्वर : वानरों के देवता
25.महाकाय : विशाल रूप वाले
26.सर्वरोगहरा : सभी रोगों को दूर करने वाले
27.प्रभवे : सबसे प्रिय
28.बल सिद्धिकर :
29.सर्वविद्या सम्पत्तिप्रदायक : ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने वाले
30.कपिसेनानायक : वानर सेना के प्रमुख
31.भविष्यथ्चतुराननाय : भविष्य की घटनाओं के ज्ञाता
32.कुमार ब्रह्मचारी : युवा ब्रह्मचारी
33.रत्नकुण्डल दीप्तिमते : कान में मणियुक्त कुंडल धारण करने वाले
34.चंचलद्वाल सन्नद्धलम्बमान शिखोज्वला : जिसकी पूंछ उनके सर से भी ऊंची है
35.गन्धर्व विद्यातत्वज्ञ, : आकाशीय विद्या के ज्ञाता
36.महाबल पराक्रम : महान शक्ति के स्वामी
37.काराग्रह विमोक्त्रे : कैद से मुक्त करने वाले
38.शृन्खला बन्धमोचक: तनाव को दूर करने वाले
39.सागरोत्तारक : सागर को उछल कर पार करने वाले
40.प्राज्ञाय : विद्वान
41.रामदूत : भगवान राम के राजदूत
42.प्रतापवते : वीरता के लिए प्रसिद्ध
43.वानर : बंदर
44.केसरीसुत : केसरी के पुत्र
45.सीताशोक निवारक : सीता के दुख का नाश करने वाले
46.अन्जनागर्भसम्भूता : अंजनी के गर्भ से जन्म लेने वाले
47.बालार्कसद्रशानन : उगते सूरज की तरह तेजस
48.विभीषण प्रियकर : विभीषण के हितैषी
49.दशग्रीव कुलान्तक : रावण के राजवंश का नाश करने वाले
50.लक्ष्मणप्राणदात्रे : लक्ष्मण के प्राण बचाने वाले
51.वज्रकाय : धातु की तरह मजबूत शरीर
52.महाद्युत : सबसे तेजस
53.चिरंजीविने : अमर रहने वाले
54.रामभक्त : भगवान राम के परम भक्त
55.दैत्यकार्य विघातक : राक्षसों की सभी गतिविधियों को नष्ट करने वाले
56.अक्षहन्त्रे : रावण के पुत्र अक्षय का अंत करने वाले
57.कांचनाभ : सुनहरे रंग का शरीर
58.पंचवक्त्र : पांच मुख वाले
59.महातपसी : महान तपस्वी
60.लन्किनी भंजन : लंकिनी का वध करने वाले
61.श्रीमते : प्रतिष्ठित
62.सिंहिकाप्राण भंजन : सिंहिका के प्राण लेने वाले
63.गन्धमादन शैलस्थ : गंधमादन पर्वत पार निवास करने वाले
64.लंकापुर विदायक : लंका को जलाने वाले
65.सुग्रीव सचिव : सुग्रीव के मंत्री
66.धीर : वीर
67.शूर : साहसी
68.दैत्यकुलान्तक : राक्षसों का वध करने वाले
69.सुरार्चित : देवताओं द्वारा पूजनीय
70.महातेजस : अधिकांश दीप्तिमान
71.रामचूडामणिप्रदायक : राम को सीता का चूड़ा देने वाले
72.कामरूपिणे : अनेक रूप धारण करने वाले
73.पिंगलाक्ष : गुलाबी आँखों वाले
74.वार्धिमैनाक पूजित : मैनाक पर्वत द्वारा पूजनीय
75.कबलीकृत मार्ताण्डमण्डलाय : सूर्य को निगलने वाले
76.विजितेन्द्रिय : इंद्रियों को शांत रखने वाले
77.रामसुग्रीव सन्धात्रे : राम और सुग्रीव के बीच मध्यस्थ
78.महारावण मर्धन : रावण का वध करने वाले
79.स्फटिकाभा : एकदम शुद्ध
80.वागधीश : प्रवक्ताओं के भगवान
81.नवव्याकृतपण्डित : सभी विद्याओं में निपुण
82.चतुर्बाहवे : चार भुजाओं वाले
83.दीनबन्धुरा : दुखियों के रक्षक
84.महात्मा : भगवान
85.भक्तवत्सल : भक्तों की रक्षा करने वाले
86.संजीवन नगाहर्त्रे : संजीवनी लाने वाले
87.सुचये : पवित्र
88.वाग्मिने : वक्ता
89.दृढव्रता : कठोर तपस्या करने वाले
90.कालनेमि प्रमथन : कालनेमि का प्राण हरने वाले
91.हरिमर्कट मर्कटा : वानरों के ईश्वर
92.दान्त : शांत
93.शान्त : रचना करने वाले
94.प्रसन्नात्मने : हंसमुख
95.शतकन्टमदापहते : शतकंट के अहंकार को ध्वस्त करने वाले
96.योगी : महात्मा
97.मकथा लोलाय : भगवान राम की कहानी सुनने के लिए व्याकुल
98.सीतान्वेषण पण्डित : सीता की खोज करने वाले
99.वज्रद्रनुष्ट :
100.वज्रनखा : वज्र की तरह मजबूत नाखून
101.रुद्रवीर्य समुद्भवा : भगवान शिव का अवतार
102.इन्द्रजित्प्रहितामोघब्रह्मास्त्र विनिवारक : इंद्रजीत के ब्रह्मास्त्र के प्रभाव को नष्ट करने वाले
103.पार्थ ध्वजाग्रसंवासिने : अर्जुन के रथ पार विराजमान रहने वाले
104.शरपंजर भेदक : तीरों के घोंसले को नष्ट करने वाले
105.दशबाहवे : दस्द भुजाओं वाले
106.लोकपूज्य : ब्रह्मांड के सभी जीवों द्वारा पूजनीय
107.जाम्बवत्प्रीतिवर्धन : जाम्बवत के प्रिय
108.सीताराम पादसेवा : भगवान राम और सीता की सेवा में तल्लीन रहने वाले।
 
हनुमान जयंती
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